मंगलवार, 28 जून 2011

हरे- मनभरे








4 टिप्‍पणियां:

  1. क्या बात है... मिट्ठू मियाँ :)

    किसी जंगल के बीच रहती हैं क्या आप पारुल जी :) :)

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  2. हरे का मन भी कभी भरा है...कुछ कुतरता है कुछ खता है...मजे का मियां मिठ्ठू है...

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  3. देख
    अभी है कच्चा दाना
    पक जाए, तो खा... !

    आनंदमय आलोक चित्र विद्या !!

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