रविवार, 19 जून 2011

जो बरसे सपने बूंद-बूंद ,नैनों को मूंद-मूंद



4 टिप्‍पणियां:

  1. जी चाहता है इन बूँद बूँद बरसते सपनों को ओक में भर के पी जाऊँ :)
    वैसे आज सुबह से ही ये सपने हमारे शहर में भी बरस रहे हैं !!

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  2. जब भी जरुरत पड़ेगी.. तस्वीर चुरा ली जायेगी. अच्छा है अब गूगल पर निर्भरता कम हो जायेगी. समय रहते आगाह कर दिया गया है, कल को रोते ना मिलना.

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  3. बस, ज़रा बरसी, बरस के थम गयी बरसात भी
    मात आखिर खा गयी वो चश्मे-तर के सामने

    भाव-पक्ष
    उत्तम !
    कला-पक्ष ..
    अति उत्तम !!

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  4. गुनगुनाती हुई गिरती हैं फलक से बूँदें
    कोई बदली तेरी पाजेब से टकराई है

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